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Thursday, 11 February 2021

नए कृषि कानूनों का किसान क्‍यों कर रहे हैं विरोध?

 हर बदलाव को सुधार नहीं कहा जा सकता है. कुछ विनाश का कारण भी बन सकते है. देश ने ऐति‍हासिक सुधार के नाम पर नोटबंदी को झेला और भयावह परिणाम देखने को मिले. इस एक कदम से लाखों नौकरियां और सैकड़ों जिंदगियां खत्म हो गईं. जीएसटी को भारत की आर्थिक आजादी के रूप में दिखाया गया. दो फीसदी जीडीपी बढ़ाने का दावा किया गया.


जीएसटी आधी रात में आ तो गया. लेकिन, जीडीपी बढ़ाने में यह मददगार साबित नहीं हुआ है. अलग से अर्थव्यवस्था को और नीचे लेकर चला गया. कोविड-19 से लड़ने के नाम पर पूरे देश में महज 4 घंटे के नोटिस पर लॉकडाउन किया गया. 21 दिन की अभूतपूर्व लड़ाई बताई गई. कोरोना तो खत्म नहीं हुआ. लेकिन, हजारों प्रवासी मजदूरों की जिंदगियां देश की सड़कों पर खत्म हो गईं. लाखों नौकरियां चली गईं. अर्थव्यवस्था निगेटिव हो गई. अब इतिहास बनाने के नाम पर किसानों को चुना गया है. सदन में तमाम हो-हल्‍ले के बीच किसानों की नई आर्थिक आजादी की कहानी लिखी जा चुकी है. एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने द्वारा लाए गए सुधारों को नई आजादी के रूप में प्रचारित किया है. लेकिन, सच कितना है, इसे लेकर कई सवाल हैं.

संसद ने किसानों के लिए 3 नए कानून बनाए हैं. पहला है ''कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020''. इसमें सरकार कह रही है कि वह किसानों की उपज को बेचने के लिए विकल्प को बढ़ाना चाहती है. किसान इस कानून के जरिये अब एपीएमसी मंडियों के बाहर भी अपनी उपज को ऊंचे दामों पर बेच पाएंगे. निजी खरीदारों से बेहतर दाम प्राप्त कर पाएंगे. लेकिन, सरकार ने इस कानून के जरिये एपीएमसी मंडियों को एक सीमा में बांध दिया है. इसके जरिये बड़े कॉरपोरेट खरीदारों को खुली छूट दी गई है. बिना किसी पंजीकरण और बिना किसी कानून के दायरे में आए हुए वे किसानों की उपज खरीद-बेच सकते हैं. क्‍या होगा असर? यही खुली छूट आने वाले वक्त में एपीएमसी मंडियों की प्रासंगिकता को समाप्त कर देगी. एपीएमसी मंडी के बाहर नए बाजार पर पाबंदियां नहीं हैं और न ही कोई निगरानी. सरकार को अब बाजार में कारोबारियों के लेनदेन, कीमत और खरीद की मात्रा की जानकारी नहीं होगी. इससे खुद सरकार का नुकसान है कि वह बाजार में दखल करने के लिए कभी भी जरूरी जानकारी प्राप्त नहीं कर पाएगी.

इस कानून से एक बाजार की परिकल्पना भी झूठी बताई जा रही है. यह कानून तो दो बाजारों की परिकल्पना को जन्म देगा. एक एपीएमसी बाजार और दूसरा खुला बाजार. दोनों के अपने नियम होंगे. खुला बाजार टैक्स के दायरे से बाहर होगा. सरकार कह रही है कि हम मंडियों में सुधार के लिए यह कानून लेकर आ रहे हैं. लेकिन, सच तो यह है कि कानून में कहीं भी मंडियों की समस्याओं के सुधार का जिक्र तक नहीं है. यह तर्क और तथ्य बिल्कुल सही है कि मंडी में पांच आढ़ती मिलकर किसान की फसल तय करते थे. किसानों को परेशानी होती थी. लेकिन कानूनों में कहीं भी इस व्यवस्था को तो ठीक करने की बात ही नहीं कही गई है. मंडी व्यवस्था में कमियां थीं. बिल्कुल ठीक तर्क है. किसान भी कह रहे हैं कि कमियां हैं तो ठीक कीजिए. मंडियों में किसान इंतजार इसलिए भी करता है क्योंकि पर्याप्त संख्या में मंडियां नहीं हैं. आप नई मंडियां बनाएं. नियम के अनुसार, हर 5 किमी के रेडियस में एक मंडी. अभी वर्तमान में देश में कुल 7000 मंडियां हैं, लेकिन जरूरत 42000 मंडियों की है. आप इनका निर्माण करें. कम से कम हर किसान की पहुंच तक एक मंडी तो बना दें. संसद में भी तो लाखों कमियां हैं. क्या सुधार के नाम पर वहां भी एक समानांतर निजी संसद बनाई जा सकती है? फिर किसानों के साथ क्यों?

क्‍या ज‍िम्‍मेदारी से बचना चाहती है सरकार? आज सरकार अपनी जि‍म्मेदारी से भाग रही है. कृषि सुधार के नाम पर किसानों को निजी बाजार के हवाले कर रही है. हाल ही में देश के बड़े पूंजीपतियों ने रीटेल ट्रेड में आने के लिए कंपनियों का अधिग्रहण किया है. सबको पता है कि पूंजी से भरे ये लोग एक समानांतर मजबूत बाजार खड़ा कर देंगे. बची हुई मंडियां इनके प्रभाव के आगे खत्म होने लगेंगी. ठीक वैसे ही जैसे मजबूत निजी टेलीकॉम कंपनियों के आगे बीएसएनल समाप्त हो गई. इसके साथ ही एमएसपी की पूरी व्यवस्था धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी. कारण है कि मंडियां ही एमएसपी को सुनिश्चित करती हैं. फिर किसान औने-पौने दाम पर फसल बेचेगा. सरकार बंधन से मुक्त हो जाएगी. ठीक वैसे ही जैसे बिहार की सरकार किसानों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गई है. वर्ष 2020 में बिहार में गेहूं के कुल उत्पादन का 1% ही सरकारी खरीद हो पाई. बिहार में यही एपीएमसी कानून तो 2006 में ही खत्म किया गया था. सबसे कम कृषि आयों वाले राज्य में आज बिहार अग्रणी है. लेकिन आज यही कानून पूरे देश के लिए क्रांतिकारी बताया जा रहा है. कोई एक सफल उदाहरण नहीं है जहां खुले बाजारों ने किसानों को अमीर बनाया हो.

बि‍हार है उदाहरण सरकार कह रही है कि निजी क्षेत्र के आने से किसानों को लंबे समय में फायदा होगा. यह दीर्घकालिक नीति है. लेकिन, बिहार में सरकारी मंडी व्यवस्था तो 2006 में ही खत्म हो गई थी. 14 वर्ष बीत गए. यह लंबा समय ही है. अब जवाब है कि वहां कितना निवेश आया? वहां के किसानों को क्यों आज सबसे कम दाम पर फसल बेचनी पड़ रही है? अगर वहां इसके बाद कृषि क्रांति आ गई थी तो मजदूरों के पलायन का सबसे दर्दनाक चेहरा यहीं क्यों दिखा? क्यों नहीं बिहार कृषि आय में अग्रणी राज्य बना? क्यों नहीं वहां किसानों की आत्महत्याएं रुकीं? कई सवाल हैं. दूसरा कानून है- ''कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत अश्वासन और कृषि सेवा करार विधेयक, 2020''. इस कानून के संदर्भ में सरकार का कहना है कि वह किसानों और निजी कंपनियों के बीच में समझौते वाली खेती का रास्ता खोल रही है. इसे सामान्य भाषा में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कहते है. आप की जमीन को एक निश्चित राशि पर एक पूंजीपति या ठेकेदार किराये पर लेगा और अपने हिसाब से फसल का उत्पादन कर बाजार में बेचेगा. यह तो किसानों को बंधुआ मजदूर बनाने की शुरुआत जैसी है. चलिए हम मान लेते हैं कि देश के कुछ किसान कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग चाहते हैं. लेकिन, कानून में किसानों को दोयम दर्जे का बना कर रख दिया गया है.

सबसे अधिक कमजोर तो किसानों को कॉन्‍ट्रैक्ट फार्मिंग में किसान और ठेकेदार के बीच में विवाद निस्तारण के संदर्भ में है. विवाद की स्थिति में जो निस्तारण समिति बनेगी उसमें दोनों पक्षों के लोगों को रखा तो जाएगा. लेकिन, हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि पूंजी से भरा हुआ इंसान उस समिति में महंगे से महंगा वकील बैठा सकता है और फिर किसान उसे जवाब नहीं दे पाएगा. इस देश के अधिकतर किसान तो कॉन्ट्रैक्ट पढ़ भी नहीं पाएंगे.

क‍ितना समर्थ है क‍िसान? कानून के अनुसार पहले विवाद कॉन्‍ट्रैक्‍ट कंपनी के साथ 30 दिन के अंदर किसान निपटाए और अगर नहीं हुआ तो देश की ब्यूरोक्रेसी में न्याय के लिए जाए. नहीं हुआ तो फिर 30 दिन के लिए एक ट्रि‍ब्यूनल के सामने पेश हो. हर जगह एसडीएम अधिकारी मौजूद रहेंगे. धारा 19 में किसान को सिविल कोर्ट के अधिकार से भी वंचित रखा गया है. कौन किसान चाहेगा कि वह महीनों लग कर सही दाम हासिल करे? वह तहसील जाने से ही घबराते हैं. उन्हें तो अगली फसल की ही चिंता होगी. तीसरा कानून है ''आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक, 2020''. यह न सिर्फ किसानों के लिए बल्कि आम जन के लिए भी खतरनाक है. अब कृषि उपज जुटाने की कोई सीमा नहीं होगी. उपज जमा करने के लिए निजी निवेश को छूट होगी. सरकार को पता नहीं चलेगा कि किसके पास कितना स्टॉक है और कहां है? खुली छूट. यह तो जमाखोरी और कालाबाजारी को कानूनी मान्यता देने जैसा है. सरकार कानून में साफ लिखती है कि वह सिर्फ युद्ध या भुखमरी या किसी बहुत विषम परिस्थिति में रेगुलेट करेगी..

सिर्फ दो कैटेगोरी में 50% (होर्टिकल्चर) और 100% (नॉन-पेरिशबल) के दाम बढ़ने पर रेगुलेट करेगी नहीं बल्कि कर सकती है कि बात कही गई है. सरकार कह रही है कि इससे आम किसानों को फायदा ही तो है. वे सही दाम होने पर अपनी उपज बेचेंगे. लेकिन यहां मूल सवाल तो यह है कि देश के कितने किसानों के पास भंडारण की सुविधा है? हमारे यहां तो 80% तो छोटे और मझोले किसान हैं. आवश्यक वस्तु संशोधन कानून, 2020 से सामान्य किसानों को एक फायदा नहीं है. इस देश के किसान गोदाम बनवाकर नहीं रखते हैं कि सही दाम तक इंतजार कर सकेंगे. सरकारों ने भी इतने गोदाम नहीं बनवाएं हैं. किसानों को अगली फसल की चिंता होती है. तो जो बाजार में दाम चल रहा होगा उस पर बेच आएंगे. लेकिन, फायदा उन पूंजीपतियों को जरूर हो जाएगा जिनके पास भंडारण व्यवस्था बनाने के लिए एक बड़ी पूंजी उपलब्ध है. वे अब आसानी से सस्ती उपज खरीद कर स्टोर करेंगे और जब दाम आसमान छूने लगेंगे तो बाजार में बेचकर लाभ कमाएंगे.

क‍िसान को सहारे की जरूरत
सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा कर चुकी है. यह देश के 14 करोड़ कृषि परिवारों का सवाल है. शांता कुमार समिति कहती है कि महज 6 फीसदी किसान ही एमएसपी का लाभ उठा पाते हैं. बाकी 94 फीसदी बाजार और बिचौलियों पर ही निर्भर रहते हैं.

अन्य क्षेत्रों की तुलना में कृषि क्षेत्र आय असमानता को सबसे अधिक देख रहा है. इसलिए किसानों को एमएसपी का कानूनी अधिकार दिए जाने की जरूरत है. कोई उनकी फसल उससे नीचे दाम पर न खरीदे. अगर कोई खरीदता है तो उस पर कानूनी कार्रवाई हो और सरकार या संबंधित व्यक्ति उसकी क्षतिपूर्ति करें. यह कितना विचारणीय विषय है कि जो किसान देश के 130 करोड़ आबादी का पेट भर रहा है, आज वह अपनी उपज का सही दाम भी हासिल नहीं कर पाता है. देश के किसी किसान या किसान संगठन ने कभी ऐसे कानूनों की मांग नहीं की थी. किसान और कृषि संगठनों की मांग हमेशा एमएसपी और उसका सी2 के आधार पर निर्धारण, कर्ज मुक्त किसान और 100% फसल खरीद की रही है. यह कानून सिर्फ किसानों के ऊपर थोपा जा रहा है. यह एक संवैधानिक प्रश्न भी है. कारण है कि कृषि राज्य और केंद्र दोनों का विषय है और यह समवर्ती सूची में आता है. एपीएमसी कानून को पारित करना राज्यों का अधिकार है. इसलिए यह कानून तो असंवैधानिक भी हो सकता है. यह भारत के फेडरल स्ट्रक्चर (संघवाद) को कमजोर करने वाला कानून है. सरकार बाजार आधारित कृषि के लिए काम कर रही है न कि देश के 14 करोड़ किसान परिवारों के लिए.

Friday, 29 June 2018

प्रतिहार/परिहार/पड़िहार/पड़ियार क्षत्रिय राजवंश

                            प्रतिहार/परिहार/पड़िहार/पड़ियार क्षत्रिय राजवंश 

प्रतिहार एक ऐसा वंश है जिसकी उत्पत्ति पर कई महान इतिहासकारों ने शोध किए जिनमे से कुछ अंग्रेज भी थे और वे अपनी सीमित मानसिक क्षमताओं तथा भारतीय समाज के ढांचे को न समझने के कारण इस वंश की उतपत्ति पर कई तरह के विरोधाभास उतपन्न कर गए। प्रतिहार एक शुद्ध क्षत्रिय वंश है जिसने गुर्जरादेश से गुज्जरों को खदेड़ने व राज करने के कारण गुर्जरा सम्राट की भी उपाधि पाई।
मनुस्मृति में प्रतिहार,परिहार, पढ़ियार तीनों शब्दों का प्रयोग हुआ हैं। परिहार एक तरह से क्षत्रिय शब्द का पर्यायवाची है। क्षत्रिय वंश की इस शाखा के मूल पुरूष भगवान राम के भाई लक्ष्मण माने जाते हैं। लक्ष्मण का उपनाम, प्रतिहार, होने के कारण उनके वंशज प्रतिहार, कालांतर में परिहार कहलाएं। कुछ जगहों पर इन्हें अग्निवंशी बताया गया है, पर ये मूलतः सूर्यवंशी हैं। पृथ्वीराज
विजय, हरकेलि नाटक, ललित विग्रह नाटक,
हम्मीर महाकाव्य पर्व (एक) मिहिर भोज की
ग्वालियर प्रशस्ति में परिहार वंश को सूर्यवंशी
ही लिखा गया है।
लक्ष्मण के पुत्र अंगद जो कि कारापथ (राजस्थान एवं पंजाब) के शासक थे,
उन्ही के वंशज परिहार है। इस वंश की 126वीं पीढ़ी में राजा हरिश्चन्द्र प्रतिहार का उल्लेख मिलता है। इनकी दूसरी पत्नी भद्रा से चार पुत्र थे।जिन्होंने कुछ धनसंचय और एक सेना का संगठन कर अपने पूर्वजों का राज्य माडव्यपुर को जीत लिया और मंडोर राज्य का निर्माण किया, जिसका राजा रज्जिल बना।इसी का पौत्र नागभट्ट प्रतिहार था, जो अदम्य साहसी,महात्वाकांक्षी और असाधारण योद्धा था।
इस वंश में आगे चलकर कक्कुक राजा हुआ, जिसका राज्य पश्चिम भारत में सबल रूप से उभरकर सामने आया। पर इस वंश में प्रथम उल्लेखनीय राजा नागभट्ट प्रथम है, जिसका राज्यकाल 730 से 760 माना जाता है। उसने जालौर को अपनी राजधानी बनाकर एक शक्तिशाली परिहार राज्य की नींव डाली। इसी समय अरबों ने सिंध प्रांत जीत लिया और मालवा और गुर्जरात्रा राज्यों पर आक्रमण कर दिया। नागभट्ट ने इन्हे सिर्फ रोका ही नहीं, इनके हाथ से सैंनधन,सुराष्ट्र, उज्जैन, मालवा भड़ौच आदि राज्यों को मुक्त करा लिया। 750 में अरबों ने पुनः संगठित होकर भारत पर हमला किया और भारत की पश्चिमी सीमा पर त्राहि-त्राहि मचा दी। लेकिन नागभट्ट कुद्ध्र होकर गया और तीन हजार से ऊपर डाकुओं को मौत के घाट उतार दिया जिससे देश ने राहत की सांस ली।
इसके बाद इसका पौत्र वत्सराज (775 से 800) उल्लेखनीय है, जिसने परिहार साम्राज्य का विस्तार किया। उज्जैन के शासन भण्डि को पराजित कर उसे परिहार साम्राज्य की राजधानी बनाया।उस समय भारत में तीन महाशक्तियां अस्तित्व में थी। परिहार साम्राज्य-उज्जैन राजा वत्सराज, 2 पाल साम्राज्य-गौड़ बंगाल राजा धर्मपाल, 3
राष्ट्रकूट साम्राज्य-दक्षिण भारत राजा
धु्रव । अंततः वत्सराज ने पाल धर्मपाल पर आक्रमण कर दिया और भयानक युद्ध में उसे पराजित कर अपनी अधीनता स्वीकार करने को विवश किया। लेकिन ई. 800 में धु्रव और धर्मपाल की संयुक्त सेना ने वत्सराज को पराजित कर दिया और उज्जैन एवं उसकी उपराजधानी कन्नौज पर पालों का अधिकार हो गया।
लेकिन उसके पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने उज्जैन को फिर बसाया। उसने कन्नौज पर आक्रमण उसे पालों से छीन लिया और कन्नौज को अपनी प्रमुख राजधानी बनाया। उसने 820 से 825-826 तक दस भयावाह युद्ध किए और संपूर्ण उत्तरी भारत पर अधिकार कर लिया। इसने यवनों, तुर्कों को भारत में पैर नहीं जमाने दिया। नागभट्ट का समय उत्तम
शासन के लिए प्रसिद्ध है। इसने 120 जलाशयों का निर्माण कराया-लंबी सड़के बनवाई। अजमेर का सरोवर उसी की कृति है, जो आज पुष्कर तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। यहां तक कि पूर्व काल में राजपूत योद्धा पुष्पक सरोवर पर वीर पूजा के रूप में नाहड़राव नागभट्ट की पूजा कर युद्ध के लिए प्रस्थान करते थे।
उसकी उपाधि ‘‘परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर थी। नागभट्ट के पुत्र रामभद्र ने साम्राज्य सुरक्षित रखा। इनके पश्चात् इनका पुत्र इतिहास प्रसिद्ध मिहिर भोज साम्राट बना, जिसका शासनकाल 836 से 885 माना जाता है। सिंहासन पर बैठते ही भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। भोज ने प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से
चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में उसे सम्राट मिहिर भोज की उपाधि मिली थी।
अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे सम्राट भोज, भोजराज, वाराहवतार, परम भट्टारक, महाराजाधिराज आदि विशेषणों से वर्णित किया गया है।
इतने विशाल और विस्तृत साम्राज्य का प्रबंध
अकेले सुदूर कन्नौज से कठिन हो रहा था। अस्तु भोज ने साम्राज्य को चार भागो में बांटकर चार उप राजधानियां बनाई। कन्नौज- मुख्य राजधानी, उज्जैन और मंडोर को उप राजधानियां तथा ग्वालियर को सह
राजधानी बनाया। प्रतिहारों का नागभट्ट
के समय से ही एक राज्यकुल संघ था, जिसमें कई राजपूत राजें शामिल थे। पर मिहिर भोज के समय बुंदेलखण्ड और कांलिजर मण्डल पर चंदलों ने अधिकार जमा रखा था। भोज का प्रस्ताव था कि चंदेल भी राज्य संघ के सदस्य बने, जिससे सम्पूर्ण उत्तरी पश्चिमी भारत एक विशाल शिला के रूप में खड़ा हो जाए और यवन, तुर्क, हूण आदि शत्रुओं को भारत प्रवेश से पूरी तरह रोका जा सके। पर चंदेल इसके लिए तैयार नहीं हुए। अंततः मिहिर भोज ने कालिंजर पर आक्रमण कर दिया
और इस क्षेत्र के चंदेलों को हरा दिया।
मिहिर भोज परम देश भक्त था-उसने प्रण किया था कि उसके जीते जी कोई विदेशी शत्रु भारत भूमि को अपावन न कर पायेगा। इसके लिए उसने सबसे पहले आक्रमण कर उन राजाओं को ठीक किया जो कायरतावश यवनों को अपने राज्य में शरण लेने देते थे। इस प्रकार राजपूताना से कन्नौज तक एक शक्तिशाली राज्य के निर्माण का श्रेय
मिहिर भोज को जाता है। मिहिर भोज के
शासन काल में कन्नौज साम्राज्य की सीमा
रमाशंकर त्रिपाठी की पुस्तक हिस्ट्री ऑफ
कन्नौज, पेज 246 में, उत्तर पश्चिम् में सतलज नदी तक, उत्तर में हिमालय की तराई, पूर्व में बंगाल तक, दक्षिण पूर्व में बुंदेलखण्ड और वत्स राज्य तक, दक्षिण पश्चिम में सौराष्ट्र और राजपूतानें के अधिक भाग तक विस्तृत थी। सुलेमान तवारीखे अरब में लिखा है, कि मिहिर भोज अरब लोगों का सभी अन्य राजाओं की अपेक्षा अधिक घोर शत्रु है।
सुलेमान आगे यह भी लिखता है कि हिन्दोस्ता
की सुगठित और विशालतम सेना भोज की थी-
इसमें हजारों हाथी, हजारों घोड़े और हजारों
रथ थे। भोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। भोज का तृतीय अभियान पाल राजाओ के विरूद्ध हुआ। इस समय बंगाल में पाल वंश का शासक देवपाल था। वह वीर और यशस्वी था- उसने अचानक कालिंजर पर आक्रमण कर दिया और कालिंजर में तैनात भोज की सेना को परास्त कर किले पर कब्जा कर लिया। भोज ने खबर पाते ही देवपाल को सबक सिखाने का निश्चय किया। कन्नौज और ग्वालियर दोनों सेनाओं को इकट्ठा होने का आदेश दिया और चैत्र मास सन् 850 ई. में देवपाल पर आक्रमण कर दिया। इससे देवपाल की सेना न केवल पराजित होकर बुरी तरह भागी, बल्कि वह मारा भी गया। मिहिर भोज ने बिहार समेत सारा क्षेत्र कन्नौज में मिला लिया। भोज को पूर्व में उलझा देख पश्चिम भारत में पुनः उपद्रव और षड्यंत्र शुरू हो
गये।
इस अव्यवस्था का लाभ अरब डकैतों ने
उठाया और वे सिंध पार पंजाब तक लूट पाट करने लगे। भोज ने अब इस ओर प्रयाण किया। उसने सबसे पहले पंजाब के उत्तरी भाग पर राज कर रहे थक्कियक को पराजित किया, उसका राज्य और 2000 घोड़े छीन लिए। इसके बाद गूजरावाला के विश्वासघाती सुल्तान अलखान को बंदी बनाया- उसके संरक्षण में पल रहे 3000 तुर्की और हूण डाकुओं को बंदी बनाकर खूंखार और हत्या के लिए अपराधी पाये गए पिशाचों को मृत्यु दण्ड दे दिया। तदनन्तर टक्क देश के शंकर
वर्मा को हराकर सम्पूर्ण पश्चिमी भारत को
कन्नौज साम्राज्य का अंग बना लिया। चतुर्थ
अभियान में भोज ने परिहार राज्य के मूल राज्य मण्डोर की ओर ध्यान दिया। त्रर्वाण,बल्ल और माण्ड के राजाओं के सम्मिलित ससैन्य बल ने मण्डोर पर आक्रमण कर दिया। मण्डोर का राजा बाउक पराजित ही होने वाला था कि भोज ससैन्य सहायता के लिए पहुंच गया। उसने तीनों राजाओं को बंदी बना लिया और उनका राज्य कन्नौज में मिला लिया। इसी अभियान में उसने गुर्जरात्रा, लाट, पर्वत आदि राज्यों को भी समाप्त कर साम्राज्य का अंग बना लिया।
---प्रतिहार/परिहार वंश की वर्तमान स्थिति---
भले ही यह विशाल प्रतिहार राजपूत
साम्राज्य 15 वीं शताब्दी के बाद में छोटे छोटे राज्यों में सिमट कर बिखर हो गया हो लेकिन
इस वंश के वंशज राजपूत आज भी इसी साम्राज्य की परिधि में मिलते हैँ।
आजादी के पहले भारत मे प्रतिहार राजपूतों के कई राज्य थे। जहां आज भी ये अच्छी संख्या में है।
मण्डौर, राजस्थान
जालौर, राजस्थान
माउंट आबू, राजस्थान
पाली, राजस्थान
बेलासर, राजस्थान
कन्नौज, उतर प्रदेश
हमीरपुर उत्तर प्रदेश
प्रतापगढ, उत्तर प्रदेश
झगरपुर, उत्तर प्रदेश
उरई, उत्तर प्रदेश
उन्नाव, उतर प्रदेश
उज्जैन, मध्य प्रदेश
चंदेरी, मध्य प्रदेश
जिगनी, मध्य प्रदेश
अलीपुरा, मध्य प्रदेश
नागौद, मध्य प्रदेश
दमोह, मध्य प्रदेश
सिंगोरगढ़, मध्य प्रदेश
एकलबारा, गुजरात
मियागाम, गुजरात
कर्जन, गुजरात
काठियावाड़, गुजरात
दुधरेज, गुजरात
खनेती, हिमाचल प्रदेश
कुमहारसेन, हिमाचल प्रदेश
प्रतिहारों की एक शाखा राघवो का राज्य
वर्तमान में उत्तर राजस्थान के अलवर, सीकर, दौसा में था जिन्हें कछवाहों ने हराया। आज भी इस क्षेत्र में राघवो की खडाड शाखा के राजपूत अच्छी संख्या में हैँ। इन्ही की एक शाखा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर, अलीगढ़,रोहिलखण्ड और दक्षिणी हरयाणा के गुडगाँव आदि क्षेत्र में बहुसंख्या में है। एक और शाखा मडाढ के नाम से उत्तर हरयाणा में मिलती है। राजस्थान के सीकर से ही राघवो की एक शाखा सिकरवार निकली है जिसका फतेहपुर सिकरी पर राज था और जो आज उत्तर प्रदेश,बिहार और मध्यप्रदेश में विशाल संख्या में मिलते हैँ। विश्व का सबसे बड़ा गाँव उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले का गहमर सिकरवार राजपूतो
का ही है। उत्तर प्रदेश में सरयूपारीण क्षेत्र में भी प्रतिहार राजपूतो की विशाल कलहंस शाखा मिलती है। इनके अलावा संपूर्ण मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तरी महाराष्ट्र आदि में जहाँ जहाँ प्रतिहार साम्राज्य फैला था अच्छी संख्या में हैँ ।। मित्रों आइए अब जानते है प्रतिहार/परिहार वंश की शाखाओं के बारे में।
भारत में परिहारों की 30 शाखा है जिसमे इन शाखाओं की भी कई उप शाखाएँ है। जिससे आज प्रतिहार/परिहार वंश पूरे भारत वर्ष में फैल गये।
== प्रतिहार/परिहार क्षत्रिय वंश की शाखाएँ ==
(1) डाभी
(2) बडगुजर (राघव)
(3) मडाड और खडाड
(4) इंदा
(5) लल्लुरा / लूलावत
(6) सूरा
(7) रामेटा / रामावत
(8) बुद्धखेलिया
(9) खुखर
(10) सोधया
(11) चंद्र
(13) माहप
(14) धांधिल
(15) सिंधुका
(16) डोरणा
(17) सुवराण
(18) कलाहँस
(19) देवल
(20) खरल
(21) चौनिया
(22) झांगरा
(23) बोथा
(24) चोहिल
(25) फलू
(26) धांधिया
(27) खखढ
(28) सीधकां
(29) कमाष / जेठवा
(30) सिकरवार
ये सभी परिहार राजाओं अथवा परिहार ठाकुरों से निकलकर बनी है। आइए अब जानते है प्रतिहार वंश के महान योद्धा शासको के बारे में जिन्होंने अपनी मातृभूमि, प्रजा व राज्य के लिए सदैव ही न्यौछावर थे।
** प्रतिहार/परिहार वंश के महान राजा **
(1) राजा हरिश्चंद्र प्रतिहार
(2) राजा नागभट्ट प्रतिहार
(3) राजा यशोवर्धन प्रतिहार
(4) राजा वत्सराज प्रतिहार
(5) राजा नागभट्ट द्वितीय प्रतिहार
(6) राजा मिहिर भोज प्रतिहार
(7) राजा महेन्द्रपाल प्रतिहार
(8) राजा महिपाल प्रतिहार
(9) राजा विनायकपाल प्रतिहार
(10) राजा महेन्द्रपाल द्वितीय प्रतिहार
(11) राजा विजयपाल प्रतिहार
(12) राजा राज्यपाल प्रतिहार
(13) राजा त्रिलोचनपाल प्रतिहार
(14) राजा यशपाल प्रतिहार
(15) राजा वीरराजदेव प्रतिहार (नागौद राज्य के संस्थापक )
Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india
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जय क्षात्र धर्म।।
नागौद रियासत।।

Monday, 11 June 2018

महाराणा प्रताप

महाराणा प्रताप

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महाराणा प्रताप सिंह
मेवाड़ के महाराणा
RajaRaviVarma MaharanaPratap.jpg
शासन१५७२ – १५९७
राज तिलक२८ फ़रवरी १५७२
पूरा नाममहाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया
पूर्वाधिकारीउदयसिंह द्वितीय
उत्तराधिकारीमहाराणा अमर सिंह[1]
जीवन संगी(11 पत्नियाँ)[2]
संतानअमर सिंह
भगवान दास
(17 पुत्र)
राज घरानासिसोदिया
पिताउदयसिंह द्वितीय
मातामहाराणी जयवंताबाई[2]
धर्मसनातन धर्म
महाराणा प्रताप सिंह ( ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रविवार विक्रम संवत १५९७ तदानुसार ९ मई १५४०–१९ जनवरी १५९७) उदयपुरमेवाड मेंसिसोदिया राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने कई सालों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया। महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलों को कईं बार युद्ध में भी हराया। उनका जन्म राजस्थान के कुम्भलगढ़ में महाराणा उदयसिंह एवं माता राणी जयवंत कँवर के घर हुआ था। १५७६ के हल्दीघाटी युद्ध में २०,००० राजपूतों को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के ८०,००० की सेना का सामना किया। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने आपना अश्व दे कर महाराणा को बचाया। प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें १७,००० लोग मारे गए। मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये। महाराणा की हालत दिन-प्रतिदिन चिंताजनक होती चली गई । २५,००० राजपूतों को १२ साल तक चले उतना अनुदान देकर भामा शाह भी अमर हुआ।

जीवन


चेतक पर सवार राणा प्रताप की प्रतिमा (महाराणा प्रताप स्मारक समिति, मोती मगरी , उदयपुर)

बिरला मंदिर, दिल्ली में महाराणा प्रताप का शैल चित्र
महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ था। महाराणा प्रताप की माता का नाम जयवंता बाई था, जो पाली के सोनगरा अखैराज की बेटी थी। महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था। महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक गोगुन्दा में हुआ।
महाराणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल ११ शादियाँ की थी उनके पत्नियों और उनसे प्राप्त उनके पुत्रों पुत्रियों के नाम है:-
  1. महारानी अजब्धे पंवार :- अमरसिंह और भगवानदास
  2. अमरबाई राठौर :- नत्था
  3. शहमति बाई हाडा :-पुरा
  4. अलमदेबाई चौहान:- जसवंत सिंह
  5. रत्नावती बाई परमार :-माल,गज,क्लिंगु
  6. लखाबाई :- रायभाना
  7. जसोबाई चौहान :-कल्याणदास
  8. चंपाबाई जंथी :- कल्ला, सनवालदास और दुर्जन सिंह
  9. सोलनखिनीपुर बाई :- साशा और गोपाल
  10. फूलबाई राठौर :-चंदा और शिखा
  11. खीचर आशाबाई :- हत्थी और राम सिंह
महाराणा प्रताप ने भी अकबर की अधीनता को स्वीकार नहीं किया था। अकबर ने महाराणा प्रताप को समझाने के लिये क्रमश: चार शान्ति दूतों को भेजा।
  1. जलाल खान कोरची (सितम्बर १५७२)
  2. मानसिंह (१५७३)
  3. भगवान दास (सितम्बर–अक्टूबर १५७३)
  4. टोडरमल (दिसम्बर १५७३)[3]

हल्दीघाटी का युद्ध

यह युद्ध १८ जून १५७६ ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे- हकीम खाँ सूरी।
इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया। इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की। वहीं ग्वालियर नरेश 'राजा रामशाह तोमर' भी अपने तीन पुत्रों 'कुँवर शालीवाहन', 'कुँवर भवानी सिंह 'कुँवर प्रताप सिंह' और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गया। ,[2]
इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध में कोई विजय नहीं हुआ। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए। अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर एेसा कुछ नहीं हुआ, ये युद्ध पूरे एक दिन चला ओेैर राजपूतों ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।

सफलता और अवसान

ई.पू. 1579 से 1585 तक पूर्व उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे और महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने में उल्झा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने ई.पू. 1585 में मेवाड़ मुक्ति प्रयत्नों को और भी तेज कर लिया। महाराणा की सेना ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और तुरंत ही उदयपूर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया। महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया , उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था , पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका। और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत ई.पू. 1585 में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा में जुट गए,परंतु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चावंड में उनकी मृत्यु हो गई।
महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सीधरने के बाद अागरा ले आया।
'एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए।

महाराणा प्रताप सिंह के मृत्यु पर अकबर की प्रतिक्रिया

अकबर महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा शत्रु था, पर उनकी यह लड़ाई कोई व्यक्तिगत द्वेष का परिणाम नहीं थी, हालांकि अपने सिद्धांतों और मूल्यों की लड़ाई थी। एक वह था जो अपने क्रूर साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था , जब की एक तरफ ये थे जो अपनी भारत मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे थे। महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर को बहुत ही दुःख हुआ क्योंकि ह्रदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था और अकबर जनता था की महाराणा जैसा वीर कोई नहीं है इस धरती पर। यह समाचार सुन अकबर रहस्यमय तरीके से मौन हो गया और उसकी आँख में आंसू आ गए।
महाराणा प्रताप के स्वर्गावसान के समय अकबर लाहौर में था और वहीं उसे सूचना मिली कि महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई है। अकबर की उस समय की मनोदशा पर अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी छंद में जो विवरण लिखा वो कुछ इस तरह है:-
अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी
गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी
नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली
न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली
गहलोत राणा जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी
निसा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी
अर्थात्
हे गेहलोत राणा प्रतापसिंघ तेरी मृत्यु पर शाह यानि सम्राट ने दांतों के बीच जीभ दबाई और निश्वास के साथ आंसू टपकाए। क्योंकि तूने कभी भी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नहीं लगने दिया। तूने अपनी पगड़ी को किसी के आगे झुकाया नहीं, हालांकि तू अपना आडा यानि यश या राज्य तो गंवा गया लेकिन फिर भी तू अपने राज्य के धुरे को बांए कंधे से ही चलाता रहा। तेरी रानियां कभी नवरोजों में नहीं गईं और ना ही तू खुद आसतों यानि बादशाही डेरों में गया। तू कभी शाही झरोखे के नीचे नहीं खड़ा रहा और तेरा रौब दुनिया पर निरंतर बना रहा। इसलिए मैं कहता हूं कि तू सब तरह से जीत गया और बादशाह हार गया।
अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपना पूरा जीवन का बलिदान कर देने वाले ऐसे वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप और उनके स्वामिभक्त अश्व चेतक को शत-शत कोटि-कोटि प्रणाम।

Monday, 28 May 2018

ओम बन्ना का इतिहास

ओम बन्ना का इतिहास 



विविधताओं से भरे हमारे देश में देवताओं, इंसानों, पशुओं, पक्षियों व पेड़ों की पूजा अर्चना तो आम बात है लेकिन हम यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा है जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है और बाकायदा लोग उस मोटर साईकिल से भी मन्नत मांगते है|
जी हाँ ! इस चमत्कारी मोटर साईकिल ने आज से लगभग २१ साल पहले सिर्फ स्थानीय लोगों को ही नहीं बल्कि सम्बंधित पुलिस थाने के पुलिस वालों को भी चमत्कार दिखा आश्चर्यचकित कर दिया था और यही कारण है कि आज भी इस थाने में नई नियुक्ति पर आने वाला हर पुलिस कर्मी ड्यूटी ज्वाइन करने से पहले यहाँ मत्था टेकने जरुर आता है

 
जोधपुर अहमदाबाद राष्ट्रिय राजमार्ग पर जोधपुर से पाली जाते वक्त पाली से लगभग 20 km पहले रोहिट थाने का " दुर्घटना संभावित" क्षेत्र का बोर्ड लगा दिखता है और उससे कुछ दूर जाते ही सड़क के किनारे जंगल में लगभग 30 से 40 प्रसाद व पूजा अर्चना के सामान से सजी दुकाने दिखाई देती है और साथ ही नजर आता है भीड़ से घिरा एक चबूतरा जिस पर एक बड़ी सी फोटो लगी,और हर वक्त जलती ज्योत | और चबूतरे के पास ही नजर आती है एक फूल मालाओं से लदी बुलेट मोटर साईकिल | यह वही स्थान है और वही मोटर साईकिल जिसका में परिचय करने जा रहा हूँ |
कौन है ओम बन्ना ? ओम बन्ना का इतिहास
यह "ओम बना" Om Bana का स्थान है ओम बना (ओम सिंह राठौड़) पाली शहर के पास ही स्थित चोटिला Chotila गांव के ठाकुर जोग सिंह जी राठौड़ के पुत्र थे जिनका इसी स्थान पर अपनी इसी बुलेट मोटर साईकिल पर जाते हुए १९८८ में एक दुर्घटना में निधन हो गया था | स्थानीय लोगों के अनुसार इस स्थान पर हर रोज कोई न कोई वाहन दुर्घटना का शिकार हो जाया करता था जिस पेड के पास ओम सिंह राठौड़ Om Singh Rathore की दुर्घटना घटी उसी जगह पता नहीं कैसे कई वाहन दुर्घटना का शिकार हो जाते यह रहस्य ही बना रहता था | कई लोग यहाँ दुर्घटना के शिकार बन अपनी जान गँवा चुके थे | 
 
ओम सिंह राठोड की दुर्घटना में मृत्यु के बाद पुलिस ने अपनी कार्यवाही के तहत उनकी इस मोटर साईकिल को थाने लाकर बंद कर दिया लेकिन दुसरे दिन सुबह ही थाने से मोटर साईकिल गायब देखकर पुलिस कर्मी हैरान थे आखिर तलाश करने पर मोटर साईकिल वही दुर्घटना स्थल पर ही पाई गई, पुलिस कर्मी दुबारा मोटर साईकिल थाने लाये लेकिन हर बार सुबह मोटर साईकिल थाने से रात के समय गायब हो दुर्घटना स्थल पर ही अपने आप पहुँच जाती | आखिर पुलिस कर्मियों व ओम सिंह के पिता ने ओम सिंह की मृत आत्मा की यही इच्छा समझ उस मोटर साईकिल को उसी पेड के पास छाया बना कर रख दिया | इस चमत्कार के बाद रात्रि में वाहन चालको को ओम सिंह अक्सर वाहनों को दुर्घटना से बचाने के उपाय करते व चालकों को रात्रि में दुर्घटना से सावधान करते दिखाई देने लगे | वे उस दुर्घटना संभावित जगह तक पहुँचने वाले वाहन को जबरदस्ती रोक देते या धीरे कर देते ताकि उनकी तरह कोई और वाहन चालक असामयिक मौत का शिकार न बने | और उसके बाद आज तक वहाँ दुबारा कोई दूसरी दुर्घटना नहीं हुयी|  
ओम सिंह राठौड़ के मरने के बाद भी उनकी आत्मा द्वारा इस तरह का नेक काम करते देखे जाने पर वाहन चालको व स्थानीय लोगों में उनके प्रति श्रधा बढ़ती गयी और इसी श्रधा का नतीजा है कि ओम बना के इस स्थान पर हर वक्त उनकी पूजा अर्चना करने वालों की भीड़ लगी रहती है उस राजमार्ग से गुजरने वाला हर वाहन यहाँ रुक कर ओम बना को नमन कर ही आगे बढ़ता है और दूर दूर से लोग उनके स्थान पर आकर उनमे अपनी श्रद्धा प्रकट कर उनसे व उनकी मोटर साईकिल से मन्नत मांगते है | मुझे भी कोई दो साल पहले अहमदबाद से जोधपुर सड़क मार्ग से आते वक्त व कुछ समय बाद एक राष्ट्रिय चैनल पर इस स्थान के बारे प्रसारित एक प्रोग्राम के माध्यम से ये सारी जानकारी मिली और इस बार की जोधपुर यात्रा के दौरान यहाँ दुबारा जाने का मौका मिला तो सोचा क्यों न आपको भी इस निराले स्थान के बारे में अवगत करा दिया जाये |
यह लेख सिर्फ इस जगह की जानकारी देने के उद्देश्य से लिखा गया है इसे विश्वास या अन्धविश्वास मानना आपके स्वविवेक पर है |

Tuesday, 28 November 2017

पड़ियार राजपूतों की कुलदेवी : गाजणमाता मंदिर की महिमा


  
राजस्थान के पाली जनपद में धरमदारी गांव में, पाली से १५ कि.मी.ऊपर पहाडी पर गाजणमाता का देवस्थान है । इस मंदिर की स्थापना १०५० वर्ष पूर्व हुई थी । मंदिर परिसर के आसपास १५ कि.मी.तक जंगल है । आषाढ शुक्ल पक्ष ९ (१३.७.२०१६)को यहां उत्सव हुआ था । इस निमित्त देवी गाजणमाता की महिमा इस लेख द्वारा प्रस्तुत कर रहे हैं ।

मंदिर का इतिहास

बहुत वर्ष पूर्व जोधपुर में राज पड़ियार का राज था । उनकी कुलदेवी चामुण्डा माता थी । अपने राजपुत्र के विवाह हेतु राजा ने देवी चामुण्डा से बारात में चलने की प्रार्थना की,तब देवी मां ने वचन दिया -मैं तेरे साथ चलती हूं । परंतु जहां मुझे कोई भक्त रोक देगा,मैं वहीं रुक जाऊंगी । बारात में जालोर जनपद के रमणीयां गांव के कृपासिंहजी भी अपनी १००० गायें लेकर आए थे । बारात जंगल से जा रही थी । साथ चल रहे रथ,घोडों और संगीत की ध्वनि से गायें डरकर भडक गईं । तब कृपासिंहजी ने गौमाता को पुकारा,हे मां !हे मां ! उसी क्षण मां चामुण्डा पहाड फाडकर अंतर्धान हुईं ! उसी दिन से गाजणमाता नाम प्रचलित हुआ । उस समय राजा के देवी मां से प्रार्थना करने पर मां ने कहा,अब मैं तुम्हारे साथ नहीं चलूंगी । अपने पुत्र के विवाह के पश्‍चात जहां तुम बंदनवार बांधने जाओगे वहां पीछे हटना क्योंकि बंदनवार बांधने के पश्‍चात छत गिर जाएगी । इससे तुम्हारी जान बच जाएगी । राजा ने विनम्रतापूर्वक मां से पूछा,इस सुनसान-घने जंगल में आपकी नित्य पूजा कौन करेगा ? मां ने कहा,जिस भक्त ने मुझे रोका है,वही मेरी पूजा करेगा । तभी से गाजणमाता की पूजा प्रारंभ हुई और उस गांव का नाम धरमदारी रखा । इसी प्रकार कृपासिंहजी के परिवार से यह पूजा आज तक संपन्न की जा रही है । जोगसिंहजी राजपुरोहितजी के पश्‍चात अब भंवरसिंहजी राजपुरोहितजी मां की पूजा-अर्चना करते हैं ।

भक्तों के निवास हेतु मंदिर में सुव्यवस्था

अ. दोनों नवरात्रि में यहां होमहवन और विशेष पूजा होती है । आषाढ मास की नवमी को गुजरात,राजस्थान से हजारों भक्त मां के दर्शन के लिए पैदल यात्रा कर अपनी मनोकामना मांगने आते हैं । पहाड पर जंगल में यह मंदिर होते हुए भी यहां अभी तक चोरी नहीं हुई।
आ. पहाड पर बसे मंदिर तक जाने के लिए पहाड के दोनों ओर से ३०० सीढियां हैं । ऊपर तक गाडी जाने की व्यवस्था भी अभी की गई है । भक्तों के निवास के लिए भी व्यवस्था उपलब्ध है ।
-श्री.भागीरथ सिंह राजपुरोहित,सिंहगड मार्ग,पुणे.

Saturday, 25 November 2017

चित्तौड़गढ़ किला वीरता की मिसाल

             चित्तौड़गढ़ किला वीरता की मिसाल

Chittorgarh Fort – चित्तौड़गढ़ किला  (चित्तोर दुर्ग) भारत के विशालतम किलो में से एक है। यह एक वर्ल्ड हेरिटेज साईट भी है। यह किला विशेषतः चित्तोड़, Chittod Ka Kila मेवाड़ की राजधानी के नाम से जाना जाता है। पहले इसपर गुहिलोट का शासन था और बाद में सिसोदिया का शासनकाल था।

चित्तौड़ी राजपूत के सूर्यवंशी वंश ने 7 वी शताब्दी से 1568 तक परित्याग करने तक शासन किया और 1567 में अकबर ने इस किले की घेराबंदी की थी। यह किला 180 मीटर पहाड़ी की उचाई पर बना हुआ है और 691.9 एकर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस किले से जुडी बहुत सी इतिहासिक घटनाये है। आज यह स्मारक पर्यटको के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
Chittorgarh Fort Chittod Ka Kila
चित्तौड़गढ़ किला वीरता की मिसाल – Chittorgarh Fort History in Hindi

15 से 16 वी शताब्दी के बाद किले को तीन बार लुटा गया था। 1303 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने राना रतन सिंह को पराजित किया था। 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने बिक्रमजीत सिंह को पराजित किया था और 1567 में अकबर ने महाराणा उड़ाई सिंह द्वितीय को पराजित किया था।

जिन्होंने इस किले को छोड़कर उदयपुर की स्थापना की थी। लेकिन तीनो समय राजपूत सैनिको ने जी-जान से लढाई की थी। उन्होंने महल को एवं राज्य को बचाने की हर संभव कोशिश की थी लेकिन हर बार उन्हें हार का ही सामना करना पड़ रहा था। चित्तोड़गढ़ किले के युद्ध में सैनिको के पराजित होने के बाद राजपूत सैनिको की तकरीबन 16,000 से भी ज्यादा महिलाओ और बच्चो ने जौहर करा लिया था। और अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था।

सबसे पहले जौहर राना रतन सिंह की पत्नी रानी पद्मिनी ने किया था। उनके पति 1303 के युद्ध में मारे गये थे और बाद में 1537 में रानी कर्णावती ने भी जौहर किया था।


इसीलिये यह किला राष्ट्रप्रेम, हिम्मत, मध्यकालीन वीरता और 7 और 16 वी शताब्दी में मेवाड़ के सिसोदिया और उनकी महिलाओ और बच्चो का राज्य के प्रति बलिदान देने का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। उस समय राजपूत शासक, सैनिक, महिलाये और स्थानिक लोग मुग़ल सेना को सरेंडर करने की बजाये लढते-लढते प्राणों की आहुति देना ठीक समझते थे।

2013 में कोलंबिया के फ्नोम पेन्ह (Phonm Penh) में वर्ल्ड हेरिटेज कमिटी के 37 वे सेशन में चित्तोड़गढ़ किले के साथ ही राजस्थान के पाँच और किलो को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साईट में शामिल किया गया था।
चित्तोड़गढ़ किले का इतिहास – Chittorgarh Kila Ka itihas

चित्तोड़गढ़ किले – Chittorgarh Fort का निर्माण 7 वी शताब्दी में मौर्य के शासन काल में किया गया था और इसका नाम भी मौर्य शासक चित्रांगदा मोरी के बाद ही रखा गया था। इतिहासिक दस्तावेजो के अनुसार चित्तौड़गढ़ किला 834 सालो तक मेवाड़ की राजधानी रह चूका था। इसकी स्थापना 734 AD में मेवाड़ के सिसोदिया वंश के शासक बाप्पा रावल ने की थी।

ऐसा कहा जाता है की इस किले को 8 वी शताब्दी में सोलंकी रानी ने दहेज़ के रूप में बाप्पा रावल को दिया था। 1568 AD में इस किले को अकबर के शासनकाल में इस किले को लूटकर इसका विनाश भी किया गया था लेकिन फिर बाद में लम्बे समय के बाद 1905 AD में इसकी मरम्मत की गयी थी। इस किले का नियंत्रण पाने के लिये तीन महत्वपूर्ण लढाईयाँ हुई थी।

1303 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने किले को घेर लिया था। 1534 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने किले को घेर लिया था और 1567 में मुग़ल बादशाह अकबर ने किले पर आक्रमण किया था। घेराबंदी के काल को यदि छोड़ दिया जाए तो यह किला हमेशा गुहिलोट के राजपूत वंश के सिसोदिया के नियंत्रण में ही था।

उन्होंने इसे बाप्पा रावल से अवतरित किया था। इस किले की स्थापना को लेकर कई प्राचीन कहानियाँ भी है और हर घेराबंदी के बाद इसके पुनर्निर्माण की भी बहोत सी कहानियाँ है।

चित्तौड़ का महाभारत में भी उल्लेख किया गया है। कहा जाता है की पांडव के भाई भीम अपने विशाल ताकत के लिये जाने जाते थे। इसीके चलते एक बार उन्होंने पानी पर भी अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया था जिससे एक कुंड का निर्माण हुआ था और उस कुंड को भीमलत कुंड के नाम से जाना जाता है।

लेकिन बाद में इसका नाम बदलकर भीमा रखा गया था। प्राचीन गाथाओ के अनुसार इस किले का निर्माणकार्य भीम ने ही शुरू किया था।

बाप्पा रावल – Bappa Rawal

प्राचीन इतिहास में हमें यह किला बाप्पा रावल से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। बाप्पा रावल के हुना साम्राज्य का पतन यशोधर्मन ने किया था। लेकिन बाद में क्षत्रिय साम्राज्य टक उर्फ़ तक्षक ने इसे जप्त कर लिया था। प्राचीन समय से ही मोरी चित्तौड़ के भगवान माने जाते थे।

लेकिन कुछ पीढियों के बाद गुहिलोट ने उनकी जगह ले ली थी। 9 वी शताब्दी में जैमल पत्ता सरोवर के किनारे हमें छोटे-छोटे बौद्ध स्तूप भी दिखाई देते है।

विजय स्तंभ – Vijay Stambha

विजय स्तंभ या जय स्तंभ को चित्तौड का प्रतिक माना जाता है और विशेष रूप से इसे विजय का प्रतिक ही माना जाता है। इसका निर्माण 1448 और 1458 के बीच राना कुम्भ ने 1440 AD में मालवा के सुल्तान महमूद शाह प्रथम खिलजी के खिलाफ जीत हासिल करने के उपलक्ष में किया था।

युद्ध के तक़रीबन 10 साल बाद इसके निर्माण की शुरुवात की गयी थी। यह 37.2. मीटर (122 फीट) ऊँचा और 47 वर्ग फीट (4.4 मी वर्ग) आधार पर बना हुआ है। 8 वी मंजिल तक इसकी तकरीबन 157 सीढियाँ है। 8 वी मंजिल से हमें चित्तौड शहर का मनमोहक नजारा दिखाई देता है।

इसपर बने गुम्बद को 19 वी शताब्दी में क्षतिग्रस्त किया गया था। लेकिन वर्तमान में इस स्तंभ को शाम के समय लाइटिंग से सजाया जाता है और और इसकी सबसे उपरी मंजिल से हम चित्तौड़ का मनमोहक नजारा देख सकते है।

नए कृषि कानूनों का किसान क्‍यों कर रहे हैं विरोध?

  हर बदलाव को सुधार नहीं कहा जा सकता है. कुछ विनाश का कारण भी बन सकते है. देश ने ऐति‍हासिक सुधार के नाम पर नोटबंदी को झेला और भयावह परिणाम द...